सरकार की चिट्टा-विरोधी मुहिम से खुली पुलिस-तंत्र की काली हकीकत
Anti chitta campaign
“सरकार की चिट्टा-विरोधी मुहिम और पुलिस-तंत्र की काली हकीकत
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू द्वारा चिट्टा-मुक्त हिमाचल के लिए छेड़ी गई प्रदेशव्यापी मुहिम आज आश्चर्यजनक रूप से सफल होती दिख रही है। इस अभियान ने न केवल सुक्खू का राजनीतिक कद ऊँचा किया है, बल्कि उन्हें व्यापक जनसमर्थन भी मिला है—विशेषकर महिलाओं का। प्रदेश की महिलाएँ साफ कह रही हैं कि “हमें 1500 रुपये की मुफ्त सौगात मत दो, लेकिन हमारे बच्चों का भविष्य बचा लो।” यह विश्वास तभी जन्मता है जब जनता महसूस करती है कि उनका नेता सचमुच उनके बच्चों की जिंदगियाँ बचाने के लिए लड़ रहा है।
लेकिन विडंबना यह है कि जिस तंत्र को क़ानून की रक्षा का दायित्व सौंपा गया है, वही तंत्र इस लड़ाई में सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ा है। चिट्टा-विरोधी अभियान ने सरकारी कर्मचारियों, खासकर पुलिस विभाग की पोल खोलकर रख दी है। यह दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है कि जिन पुलिसवालों को समाज की सुरक्षा का जिम्मा दिया गया है, वही कानून तोड़कर चिट्टा माफिया के संरक्षक बन बैठे हैं। “बाड़ ही खेत को खा रही है”—आज यह कहावत हिमाचल के लिए कटु सच बन गई है।
पुलिस, विजिलेंस, CID और अन्य सरकारी सुरक्षा तंत्र भारी-भरकम तनख्वाहें पाने के बावजूद अवैध चिट्टा तस्करी में लिप्त पाए जा रहे हैं। जिनको कानून की रक्षा करनी थी, वही कानून की धज्जियाँ उड़ाकर करोड़ों रुपये कमा रहे हैं। यह प्रदेश के लिए ही नहीं, भारतीय लोकतंत्र की आत्मा के लिए भी गंभीर खतरा है।
स्थानीय राजनीति से गठजोड़ कर कुछ पुलिसकर्मी छोटे अपराधियों पर 20 ग्राम की तस्करी के मामूली केस बनाकर अपनी पीठ थपथपाते रहते हैं, जबकि असल में बड़े ड्रग-नेटवर्क का चिट्टा खुद बेचते हैं। तस्कर पुलिस की जेबें नोटों से भर देते हैं। कई मामलों में तो रिश्वत के रूप में कारें, जीपें और कीमती गाड़ियाँ तक भेंट की जाती हैं—बदले में सिर्फ “छोटा-सा केस” या फिर पूरी “क्लीन चिट।” उधर नेता खुश कि उनकी वोट बैंक राजनीति सुरक्षित, और इधर पुलिस खुश कि उनका अवैध धंधा चलता रहे। इस पूरे खेल में सबसे बड़ा नुकसान होता है—हिमाचल के बच्चों और युवाओं का।
यही कारण है कि यह सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या मुख्यमंत्री की यह मुहिम पूरी पारदर्शिता से चल रही है? या फिर पुलिस वाले एक-दूसरे को ही बचाते घूम रहे हैं? आज हालात ऐसे हैं कि एक सिपाही से लेकर शीर्ष पुलिस अधिकारी तक—हर स्तर पर संलिप्तता के आरोप उभर रहे हैं। पुलिस संरक्षण के बिना इतना बड़ा अवैध कारोबार किसी भी हालत में फल-फूल नहीं सकता।
सरकार को चाहिए कि ऐसे अपराधी पुलिसकर्मियों को सिर्फ निलंबित ही नहीं, बल्कि तत्काल ड्यूटी से बर्खास्त किया जाए। जब तक यह सख्ती नहीं होगी, चिट्टा माफिया और पुलिस की सांठगांठ प्रदेश की नई पीढ़ी को खतरनाक दलदल में धकेलती रहेगी। हिमाचल का भविष्य बचाने के लिए यह कदम अब अनिवार्य हो चुका है।
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