राधा स्वामी सत्संग परौर:में नेशनल हाईवे पर लगा भयंकर ट्रैफिक जाम, मचा कोहराम, प्रशासन और सरकार की लापरवाही से मरीज़ों की जान पर बन आई बच्चे नहीं ले पाए अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस में भाग, पिछले कई दिनों से स्कूलों में चल रही थी योग दिवस की तैयारी, सब धरा का धरा रह गया
लोगों का मानना है कि हो सकता है बाबा जी इस बाद इंतजाम्मी से बेखबर हों, जनता के साथ क्या बीत रही है शायद यह ख़बर उन तक नहीं पहुंची होगी

Dr Sushama Sood






राधा स्वामी सत्संग परौर: बाबा जी के आगमन से लगा भयंकर ट्रैफिक जाम, मचा कोहराम, प्रशासन और सरकार की लापरवाही से मरीज़ों की जान पर बन आई बच्चे नहीं ले पाए अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस में भाग, पिछले कई दिनों से स्कूलों में चल रही थी योग दिवस की तैयारी, सब धरा का धरा रह गया

Dalip Singh Jamwal
राधा स्वामी सत्संग परौर में बाबा जी के तीन दिवसीय प्रवास ने पूरे क्षेत्र को जाम के नरक में धकेल दिया। नेशनल हाईवे पर लगी भारी भीड़ और जाम ने आम जनता को दो दिन तक बुरी तरह त्रस्त कर दिया। खास बात यह रही कि न तो पुलिस प्रशासन तैयार था, न ही सत्संग प्रबंधन ने गहराई से कोई सार्वजनिक जिम्मेदारी निभाई।
आज अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के दिन जब स्कूलों, कॉलेजों और सरकारी संस्थानों में विशेष कार्यक्रम आयोजित होने थे, लोग अपने ही शहर में फंसे रह गए। नगरोटा से लेकर पालमपुर तक जाम की स्थिति बनी रही। कई बसें तो रास्ते में ही लौट गईं, लोग पैदल ही मीलों चलने को मजबूर हुए।
लेकिन सबसे शर्मनाक स्थिति तब देखने को मिली जब एम्बुलेंसों को जाम में घंटों फंसे रहना पड़ा। कई बीमारों की हालत बिगड़ गई, कुछ को समय पर अस्पताल तक नहीं पहुंचाया जा सका। सवाल उठता है — क्या यह आध्यात्मिक आयोजन है, या आम जनता की जान के साथ खिलवाड़?
हर साल ऐसा ही होता है। बाबा जी के सत्संग के नाम पर सड़कें बंद हो जाती हैं, जनता को परेशानी झेलनी पड़ती है, लेकिन कोई कुछ नहीं करता। सत्संग प्रबंधन बाबा जी की ‘आध्यात्मिकता’ की आड़ में खुद को जवाबदेही से ऊपर मानता है। खुले तौर पर वे कुछ नहीं बोलते, लेकिन व्यवस्थाएं ध्वस्त हो जाती हैं।
अंदरखाने लोग ये सवाल कर रहे हैं कि जब बाबा जी को आना है तो क्या ऐसा शोभा देता है कि उनके कारण अस्पतालों की एम्बुलेंस फंसी रहें, छात्र स्कूल न पहुंचें, और बीमार सड़कों पर तड़पते रहें? क्या यही सेवा है? क्या यही आध्यात्मिकता है? बाबा जी की पूरी व्यवस्था गुप्त ढंग से, खुद के लिए सुचारु रहती है, लेकिन जनता के लिए अराजकता फैली रहती है।
इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस प्रशासन की विफलता सबसे ज़्यादा उजागर हुई है। न कोई ट्रैफिक प्लान, न वैकल्पिक मार्ग, न मौके पर कोई ठोस उपस्थिति। बस मूकदर्शक बनकर तमाशा देखते रहे।
इससे भी अधिक शर्मनाक बात यह है कि सरकार जानबूझकर इन आयोजनों से आँख मूंदे रहती है। वोट बैंक की राजनीति के चलते प्रशासन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। हर बार यही कहा जाता है कि “अगली बार व्यवस्था बेहतर होगी”, लेकिन अगली बार सिर्फ़ और भी भयावह साबित होती है।
लोगों का आक्रोश अब सड़कों पर है। सवाल उठते हैं — क्या आध्यात्मिक आयोजनों की आड़ में जनता को यूं ही कुचला जाता रहेगा? कब तक वोटों की राजनीति आम नागरिकों की ज़िंदगी पर भारी पड़ती रहेगी?
अगर चाहें तो इसके लिए विज़ुअल ट्रैफिक जाम का चित्र या गुस्से में प्रतिक्रिया दे रहे नागरिकों की छवि बना सकता हूँ.
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