वकील साहब, रंजिश छोड़िए — प्रदेश हित की सोचिये! यह एक्सटेंशन नहीं, सेवा का विस्तार है! आपको मलाई मिल जाती तो सब ठीक था…









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“वकील साहब, रंजिश छोड़िए — यह एक्सटेंशन नहीं, सेवा का विस्तार है!”

वकील साहब, अगर किसी से निजी रंजिश है तो सीधे नाम लेकर कहिए, मगर हर बार पूरी सरकार, सिस्टम और पड़ोसियों को लपेट लेना अब आपकी पहचान बन चुकी है। इन दिनों सोशल मीडिया पर आपके रोज़ाना बयान ऐसे लगते हैं मानो सरकार का विरोध करना आपकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया हो। ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू, जो आम जनता के मुख्यमंत्री माने जाते हैं, उनकी नीतियों पर रोज़ प्रहार कर देना आपकी पुरानी आदत बन चुकी है।
असल बात तो यह है कि जब सरकार ने आपकी मनचाही पद-प्रतिष्ठा नहीं दी — जो कभी “राजा साहब के ज़माने” में एडिशनल एडवोकेट जनरल के रूप में मिली थी — तभी से आपकी जुबान सरकार विरोध की तलवार बन गई। हाल में आपने पालमपुर अस्पताल में एक डॉक्टर को एक्सटेंशन दिए जाने पर सोशल मीडिया में फिर से बयानबाज़ी शुरू कर दी, यहां तक कि मुख्यमंत्री के सलाहकारों तक को इसमें घसीट लिया।
लेकिन जरा सोचिए, जिस डॉक्टर को लेकर आप इतना बवाल मचा रहे हैं, क्या आपने कभी अस्पताल जाकर हालात देखे हैं? वहां हाल ही में पांच डॉक्टरों के तबादले हो चुके हैं और पद खाली पड़े हैं। मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और डॉक्टरों पर काम का बोझ कई गुना बढ़ गया है। ऐसे में अगर सरकार किसी अनुभवी और समर्पित डॉक्टर को एक्सटेंशन देती है, तो यह जनता के हित का फैसला है, न कि किसी “जीजा जी” का पक्षपात।
वकील साहब, आपको एक बात और समझनी चाहिए — यह डॉक्टर हैं, कोई क्लास-4 कर्मचारी नहीं। जितनी तनख्वाह सरकार उन्हें दे रही है, यानी करीब 80 हज़ार रुपये, उससे कहीं ज्यादा वे किसी भी प्राइवेट अस्पताल में एक से डेढ़ लाख रुपये तक आसानी से कमा सकते हैं। चाहें तो अपना क्लिनिक खोल लें, तो वहां भी खूब कमाई है। फिर भी वे सरकारी अस्पताल में रहकर कम वेतन पर सेवा कर रहे हैं — यही उनका असली सेवा भाव है, और यही “डॉक्टर धर्म” है।
डॉक्टर की यह एक्सटेंशन सरकार की नहीं, मरीजों की जरूरत है। जब विशेषज्ञों की भारी कमी हो और कोई अनुभवी डॉक्टर खुद आगे बढ़कर सेवा देना चाहे, तो उसे रोकना नासमझी होगी। ऐसे डॉक्टरों के कारण ही हजारों मरीजों को इलाज के लिए बाहर नहीं जाना पड़ता।
सरकार ने जो किया, वह किसी रिश्तेदारी का इनाम नहीं, बल्कि मानवीय विवेक का प्रमाण है। मुख्यमंत्री सुक्खू और उनकी टीम ने जो कदम उठाया है, वह राजनीतिक नहीं — व्यवहारिक है।
वकील साहब, आलोचना कीजिए, यह आपका अधिकार है। लेकिन आलोचना और निजी खुन्नस में फर्क होता है। सरकार को बदनाम करने से जनता का भला नहीं होगा। अगर सचमुच लोगों की चिंता है तो बताइए — डॉक्टरों की कमी कैसे पूरी हो, स्वास्थ्य सेवाएं कैसे सुधरें? वरना अस्पताल जाकर मरीजों की हालत देख लीजिए, तब समझ आएगा — यह एक्सटेंशन “रेवड़ी” नहीं, बल्कि जनता के लिए “राहत” है।





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