आम आदमी पार्टी हिमाचल—पुनर्गठन की दिशा में एक गंभीर मंथन की आवश्यकता, “विशाल राणा ही पार लगा सकते हैं आम आदमी पार्टी की नैया”

हिमाचल में आम आदमी पार्टी—संगठन की स्थिति पर मंथन जरूरी
RAJESH SURYAVANSHI, Editor-in-Chief, HR Media Group, Founder Chairman Mission Against Corruption Society, H.P. Mob 9418130904

हिमाचल प्रदेश में आम आदमी पार्टी (AAP) एक बार फिर गंभीर संगठनात्मक संकट से गुजर रही है। बीते कुछ समय में पार्टी के कई कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों द्वारा अचानक इस्तीफा देना इस बात का संकेत है कि भीतर कुछ न कुछ बहुत गलत चल रहा है। हाल ही में एक वरिष्ठ प्रोफेसर ने, जो पहले पार्टी में सक्रिय थे, स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब शीर्ष नेतृत्व ही निष्क्रिय हो जाए, तो नीचे के कार्यकर्ता दिशा और ऊर्जा दोनों खो बैठते हैं। उन्होंने पारिवारिक कारणों का हवाला जरूर दिया, लेकिन उनकी बातों से यह साफ झलकता है कि पार्टी में भ्रम की स्थिति और संवादहीनता ने उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

यह लेख मैं एक निष्पक्ष पत्रकार के रूप में लिख रहा हूं। इसमें किसी भी नेता विशेष का पक्ष लेना उद्देश्य नहीं है, न ही मेरा किसी से कोई व्यक्तिगत संबंध है। मेरा उद्देश्य केवल इतना है कि संगठन की गिरती स्थिति पर तथ्यपरक विश्लेषण किया जाए, ताकि यदि सही समय पर आत्ममंथन हो तो पार्टी खुद को दोबारा सक्रिय कर सके।

जब हम पार्टी के इतिहास पर नज़र डालते हैं तो यह स्पष्ट होता है कि 2021-22 का कालखंड हिमाचल में AAP के लिए सबसे सक्रिय और सकारात्मक रहा। उस समय युवा विंग के प्रदेशाध्यक्ष रहे विशाल राणा और तत्कालीन अध्यक्ष निक्का पटियाल के नेतृत्व में संगठन ने प्रदेश के लगभग हर विधानसभा क्षेत्र में जनाधार बनाना शुरू कर दिया था। “ऑक्सीमीटर अभियान” जैसे स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रमों ने पार्टी को केवल एक राजनीतिक दल ही नहीं, बल्कि एक जनसेवा की भावना रखने वाले संगठन के रूप में स्थापित कर दिया था।

उस समय मीडिया में विशाल राणा को लेकर चर्चा थी कि उन्होंने पूरे प्रदेश में युवाओं, कर्मचारियों, शिक्षकों, और स्थानीय नेताओं को जोड़ा है। कई बड़े अफसर, कर्मचारी संघों के नेता, शिक्षाविद और पूर्व नौकरशाह पार्टी से जुड़ने को तैयार थे। यही वह समय था जब मीडिया ने आम आदमी पार्टी को हिमाचल में कांग्रेस और भाजपा के विकल्प के रूप में देखना शुरू कर दिया था।

लेकिन फिर एक दौर ऐसा आया जब दिल्ली से भेजे गए कुछ प्रभारियों ने संगठनात्मक फैसलों में अनुभव की बजाय निजी पसंद-नापसंद को प्राथमिकता दी। ऐसे समर्पित कार्यकर्ता जिन्हें पार्टी का मूल स्तंभ कहा जा सकता था, उन्हें किनारे कर दिया गया। कुछ ऐसे चेहरों को ज़िम्मेदारी सौंपी गई जो न तो ज़मीनी सच्चाइयों से परिचित थे और न ही पार्टी की मूल भावना को समझते थे। परिणामस्वरूप न केवल संगठन बिखर गया, बल्कि पार्टी का जनाधार भी तेजी से घटा।

पार्टी ने चुनावों में कई ऐसे प्रत्याशी उतारे जिन्हें न जनता पहचानती थी और न ही कार्यकर्ता। जो लोग AAP के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे थे, उन्हें दरकिनार कर बाहरी चेहरों को टिकट दिए गए। इसका नतीजा यह हुआ कि पूरे प्रदेश में आम आदमी पार्टी को मात्र 8,000–10,000 वोट ही मिले — जो कि किसी राष्ट्रीय पार्टी के लिए अत्यंत शर्मनाक आंकड़ा है।

आज प्रदेश में बीजेपी और कांग्रेस की छवि कमजोर पड़ी है। भ्रष्टाचार, आंतरिक गुटबाजी और जनता से कटाव इन दोनों ही दलों के लिए संकट बने हुए हैं। जनता एक वैकल्पिक नेतृत्व की ओर देख रही है, लेकिन AAP फिलहाल उसे वह विकल्प देने में सक्षम नजर नहीं आ रही। अगर कोई नेतृत्व पार्टी को इस स्थिति से उबार सकता है, तो उसे संगठन की नब्ज और कार्यकर्ताओं की भावनाओं की समझ होनी चाहिए।

यहां पर पूर्व युवा प्रदेशाध्यक्ष विशाल राणा का नाम चर्चा में आना स्वाभाविक है। यह किसी व्यक्ति विशेष की वकालत नहीं, बल्कि तथ्यात्मक विश्लेषण है। उनके कार्यकाल में पार्टी ने संगठनात्मक मजबूती, जनसंपर्क और मीडिया स्पेस तीनों ही स्तरों पर प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराई थी। उनके संपर्कों में प्रदेश के बड़े नेता, पूर्व प्रशासनिक अधिकारी और कर्मचारी नेता शामिल थे, जो पार्टी की ताकत बन सकते थे। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसे प्रयासों को उस समय के कुछ गलत फैसलों ने विफल कर दिया।

अगर आज आम आदमी पार्टी हिमाचल में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाना चाहती है, तो उसे पुराने अनुभवी कार्यकर्ताओं को फिर से साथ जोड़ना होगा। केवल दिल्ली से आए निर्देशों से संगठन नहीं चलता, उसे ज़मीनी नेतृत्व, पारदर्शिता और सामूहिक संवाद की आवश्यकता होती है।

निष्कर्षतः, संगठन तभी मज़बूत होता है जब वह पुराने और नए कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चले, संवाद की संस्कृति को बढ़ावा दे और अनुभव को प्राथमिकता दे। विशाल राणा जैसे नेताओं का फिर से सक्रिय होना पार्टी के लिए लाभदायक हो सकता है, लेकिन यह फैसला नेतृत्व को अपने विवेक और संगठनहित में लेना होगा।

(लेखक: राजेश सूर्यवंशी, प्रधान संपादक, HR Media Group। प्रस्तुत विचार विशुद्ध रूप से निष्पक्ष विश्लेषण पर आधारित हैं, न कि किसी राजनीतिक या व्यक्तिगत झुकाव पर।)

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