













भुवनेश सूद और रमेश भाऊ के नाम रही बाला सुंदरी मेले की वो हसीं शाम
– एक संपादकीय दृष्टिकोण

सुलाह के ऐतिहासिक मैदान में आयोजित माता बाला सुंदरी मेले की दूसरी संध्या सिर्फ भक्ति और भव्यता की नहीं थी—वो एक ऐसी शाम थी जिसने समाजसेवा, नेतृत्व और विनम्रता की अनूठी मिसाल पेश की।
जहाँ एक ओर मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित समाजसेवी, शिक्षाविद और उद्यमी भुवनेश सूद किसी अत्यावश्यक कार्यवश उपस्थित नहीं हो सके, वहीं दूसरी ओर उन्होंने अपने स्थान पर ऐसे व्यक्ति को मंच सौंपा जिनका जीवन भी सेवा से परिभाषित होता है—नेशनल हेराल्ड राष्ट्रीय समाचार पत्र के वरिष्ठ पत्रकार, हिमाचल रिपोर्टर की चीफ एडिटर व समाजसेवी और पंचायत समिति पंचरुखी के पूर्व अध्यक्ष रमेश भाऊ।
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इस बदलाव ने उस संध्या को एक औपचारिक समारोह से कहीं आगे बढ़ा दिया। रमेश भाऊ का मंच से दिया गया भाषण केवल शब्दों का नहीं, संवेदना और सामाजिक चेतना का प्रतिबिंब था। उन्होंने जिस भावुकता और सहजता से भुवनेश सूद की उदारता की सराहना की—वो एक दानवीर को दूसरे समाजसेवी की श्रद्धांजलि थी। उनका कथन कि “पैसा तो बहुत लोगों के पास होता है, लेकिन खर्चने की हिम्मत कुछ ही में होती है,” सीधे दिलों को छू गया।
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और बात केवल प्रशंसा तक सीमित नहीं रही—भुवनेश सूद की और से रमेश भाऊ ने ₹21,000 की धनराशि भेंट कर यह दिखा दिया कि जब शब्दों के पीछे कर्म खड़े हों, तब मंच पर बोलने वाले केवल अतिथि नहीं, प्रेरणा बन जाते हैं।
उस शाम की सबसे खूबसूरत बात यह रही कि मंच पर आस्था के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी की गूंज थी। मिशन अगेंस्ट करप्शन के चेयरमैन राजेश सूर्यवंशी की मौजूदगी ने मेसेज दिया कि धर्म और सामाजिक बदलाव एक ही धारा के दो किनारे हैं—साथ बह सकते हैं, जब सोच नेक हो।
इस मेले की सफलता केवल भीड़ या सजावट में नहीं थी, बल्कि उस सोच में थी जो कहती है—समारोह केवल उत्सव नहीं, अवसर हैं कुछ बेहतर करने के।
वह हसीं शाम, जो भुवनेश सूद की निस्वार्थ सेवा भावना और रमेश भाऊ के सहज नेतृत्व को समर्पित थी, आने वाले आयोजनों के लिए एक आदर्श बनकर रह गई है।![]()










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