CSKHPKV :वरिष्ठता को दरकिनार कर कार्यवाहक कुलपति की नियुक्ति पर सवाल — हाईकोर्ट ने मांगा राज्यपाल से स्पष्टीकरण, राज्यपाल का मौन संकट: हाईकोर्ट ने उठाए सवाल, सरकार बोली — शिक्षा व्यवस्था को रोकने का अधिकार किसी को नहीं”

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“राज्यपाल का मौन संकट: हाईकोर्ट ने उठाए सवाल, सरकार बोली — शिक्षा व्यवस्था को रोकने का अधिकार किसी को नहीं”

शिमला : राजेश सूर्यवंशी,  एडिटर-इन -चीफ,  हिमाचल रिपोर्टर मीडिया नेटवर्क

माननीय हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने डॉ. राकेश कुमार कपिला बनाम राज्य हिमाचल प्रदेश व अन्य मामले में सुनवाई के दौरान कहा कि विधानसभा द्वारा दूसरी बार पारित कुलपति नियुक्ति संशोधन विधेयक पर राज्यपाल को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार समय सीमा में हस्ताक्षर कर देने चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि विधेयक पर निर्णय में देरी से विश्वविद्यालयों में एड-हॉक व्यवस्थाएं कायम हो रही हैं, जिससे विद्यार्थियों और शिक्षकों दोनों के हित प्रभावित हो रहे हैं।

मामला कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर में कार्यवाहक कुलपति की नियुक्ति को लेकर उठा। याचिकाकर्ता डॉ. राकेश कुमार कपिला, जो वरिष्ठता सूची में प्रथम हैं, ने तर्क दिया कि उन्हें दरकिनार करते हुए कनिष्ठ सदस्य को कार्यवाहक कुलपति बनाना कानूनी रूप से गलत है।

राज्यपाल पक्ष के अधिवक्ताओं ने धारा 24(5) का हवाला देते हुए कहा कि कुलपति की अस्थायी अनुपस्थिति में किसी सीनियर फैकल्टीसदस्य को कार्यभार दिया जा सकता है।

परंतु तथ्य यह हैकि पालमपुर कृषि विश्वविद्यालय में कुलपति का पद 2022 से स्थायी रूप से रिक्त है, और ऐसी स्थिति में फैकल्टी में से कार्यवाहक कुलपति की नियुक्ति करना नियम का उल्लंघन है क्योंकि स्थाई रूप से रिक्त पड़े पद पर एक्ट 24-5 में कार्यवाहक कुलपति लगाने का कोई प्रावधान ही नहीं है।

कुदरत की विडंबना तो देखिए कि राज्यपाल के पक्षधर ने अनायास ही अदालत में इस उल्लंघन को स्वीकार भी किया है।

न्यायालय ने राज्यपाल से यह स्पष्ट करने को कहा कि जब डॉ. कपिला सबसे वरिष्ठ प्रोफेसर हैं, तो उन्हें कार्यवाहक कुलपति के लिए “उपयुक्त” क्यों नहीं माना गया।

सरकार के पक्ष में तर्क:
राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि विधानसभा ने विधेयक दोबारा पारित कर दिया था और राज्यपाल द्वारा उस पर एक माह में हस्ताक्षर न करना संविधान और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन है। एडवोकेट जनरल ने अदालत में कहा कि राज्यपाल का मौन रवैया शिक्षा व्यवस्था को बाधित कर रहा है, जिससे विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक अस्थिरता फैल रही है। सरकार का मत है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधानसभा द्वारा पारित विधेयक पर राज्यपाल केवल औपचारिक स्वीकृति देते हैं — उसे रोकने का अधिकार नहीं है।
उच्च न्यायालय ने इस मामले में 3 नवंबर 2025 तक राज्यपाल से स्पष्टीकरण तलब किया है। अदालत ने यह भी माना कि वरिष्ठता की अनदेखी कर कनिष्ठ सदस्य को कार्यवाहक कुलपति नियुक्त करना न केवल विश्वविद्यालय अधिनियम का उल्लंघन है, बल्कि वरिष्ठतम प्रोफेसर के अधिकारों के साथ भी अन्याय है।
न्यायालय की टिप्पणी:
“राज्यपाल को विधेयक पर निर्णय टालने का अधिकार नहीं, राज्य की शिक्षा व्यवस्था के हित में शीघ्र निर्णय लिया जाए।”

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