कर्मचारियों में मचा हड़कंप : OPS बचाना है या Review करवाना है?—कर्मचारियों के भविष्य का सबसे बड़ा फैसला

OPS बचाना है या Review करवाना है?—कर्मचारियों के भविष्य का सबसे बड़ा फैसला

RAJESH SURYAVANSHI, Editor-in-Chief, HR Media Group, Founder Chairman Mission Against Corruption Society, H.P. Mob 9418130904

 

हिमाचल की राजनीति में इन दिनों एक नारा बहुत तेजी से उभर रहा है— “OPS बचाना है या Review करवाना है?” विधानसभा सत्र के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री व नेता विपक्ष जयराम ठाकुर ने एक ऐसा बयान दे दिया जिसने पूरे प्रदेश के लाखों कर्मचारियों की नींद उड़ा दी। उन्होंने कहा कि अगर भाजपा सत्ता में वापस आई तो सुक्खू सरकार के सभी फैसलों का Review किया जाएगा। यही वह पल था जब उनकी जुबान से अनजाने में वह सच्चाई निकल गई जिसका डर कर्मचारी वर्षों से छुपा कर बैठे थे—कि भाजपा वापस आते ही OPS यानी पुरानी पेंशन स्कीम को खत्म कर सकती है।

हालाँकि बाद में उन्होंने सफाई दी कि वह OPS के Review की बात नहीं कर रहे थे, मगर जब उन्होंने “सभी निर्णयों” के Review की बात कही तो यह साफ हो गया कि OPS सबसे पहले निशाने पर होगा।

याद रहे—इसी OPS के वायदे पर सुक्खू सरकार सत्ता में आई और जयराम ठाकुर को करारी हार मिली। इसलिए कर्मचारियों में यह आशंका स्वाभाविक है कि भाजपा की वापसी मतलब OPS समाप्त।

क्यों OPS कर्मचारियों का केवल अधिकार नहीं, बल्कि उनका बुढ़ापे का सहारा है?

एक सरकारी कर्मचारी 30–35 वर्ष लगातार सेवा करता है।

इन तीन दशकों में वह:

बच्चों की पढ़ाई

उच्च शिक्षा

घर-परिवार के खर्च

इलाज

मकान निर्माण

सामाजिक दायित्व

इन सभी में अपनी तनख्वाह का अधिकांश हिस्सा लगा देता है।

एक कर्मचारी की जिंदगी बचत की नहीं, जिम्मेदारियों की कहानी है।

इसके ऊपर लगभग 30% इनकम टैक्स, जीपीएफ, विभिन्न कटौतियाँ—ये सब मिलकर एक कर्मचारी के पास बचत के नाम पर बहुत कम धन छोड़ते हैं। सबसे बड़ी बात—सरकारी नौकरी में रहते हुए वह कोई दूसरा व्यवसाय, पार्ट-टाइम जॉब या अतिरिक्त आय का साधन भी नहीं अपना सकता।

ऐसे में यदि उसकी बुढ़ापे की एकमात्र सुरक्षा OPS छीन ली जाए तो उसका पूरा भविष्य अंधकारमय हो जाता है।

NPS क्यों खतरनाक है?

NPS बाज़ार आधारित है—भविष्य शेयर मार्केट के भरोसे!

कर्मचारी को यह भी नहीं पता कि रिटायरमेंट पर कितनी राशि मिलेगी।

किसी वर्ष लाभ मिलेगा या नुकसान—सारी अनिश्चितता उसके भाग्य पर छोड़ दी जाती है।

लेकिन OPS एक गारंटी है—

जीवनभर के संघर्ष का सम्मान है।

रिटायरमेंट के बाद भी गरिमा से जीने का अधिकार है।

जब एक कर्मचारी रिटायर होता है…

60 वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते:

शरीर जवाब देने लगता है

L

दोबारा नौकरी या ट्रेनिंग असंभव होती है

नया काम शुरू करने की हिम्मत नहीं रहती

बच्चों पर निर्भरता बढ़ जाती है

ऐसे समय में अगर पेंशन भी न मिले तो कर्मचारी का जीवन त्रासदी बन जाता है।

वही बच्चे जिनके लिए उसने पूरी उम्र संघर्ष किया, शिक्षा दिलाई, करियर बनाया—कभी-कभी वही बच्चे माता-पिता को बोझ की तरह देखने लगते हैं।

OPS छीन ली गई तो एक कर्मचारी:

आर्थिक रूप से टूटेगा

मानसिक रूप से दबाव में आएगा

सामाजिक रूप से कमजोर होगा

और जीवनभर की कमाई संघर्ष में मिटी में मिल जाए

राजनीतिक सच—BJP ने अपने घोषणापत्र में OPS का उल्लेख तक नहीं किया

यह भी याद रखना होगा कि बीजेपी ने पिछले चुनाव में OPS लागू करने का वादा नहीं किया।

इससे यह स्पष्ट है कि BJP कर्मचारियों को OPS का लाभ देने के पक्ष में कभी नहीं रही।

इसके उलट सुक्खू सरकार ने OPS का वादा किया, उसे लागू किया और इसी के दम पर सत्ता में आई।

अब सवाल जनता और कर्मचारियों के सामने है—

क्या OPS बचानी है?

या Review करवाकर OPS दोबारा खोनी है?

अगर भाजपा सत्ता में आती है और Review करती है तो OPS का भविष्य खतरे में है—यह कर्मचारियों ने जयराम ठाकुर के बयान से समझ लिया है।

इसलिए यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं होगा—

यह कर्मचारियों के बुढ़ापे, सुरक्षा, सम्मान और जीवनभर की गारंटी का फैसला होगा।

**अंतिम सवाल—

OPS बचानी है या Review करवाना है?

सुख सरकार को दोबारा लाना है या OPS खोने का जोखिम उठाना है?**

जवाब हर कर्मचारी के दिल में पहले से मौजूद है—

OPS सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि संघर्ष में बीती जिंदगी की आखिरी उम्मीद है।

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