




काश! डॉ. शिव कुमार होते — तो कब का बन गया होता रोटरी “राम भवन”
— प्रवीन कुमार, पूर्व विधायक

पालमपुर के रोटरी भवन से जुड़ा इतिहास केवल ईंट-पत्थरों का नहीं, बल्कि उस संकल्प, संघर्ष और बलिदान का साक्षी है, जिसने आज अयोध्या में भव्य राम मंदिर का रूप लिया है। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि जून 1989 में पालमपुर के इसी रोटरी भवन में आयोजित भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक के अंतिम दिन अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ था। यही वह भूमि है जहाँ से राम मंदिर आंदोलन को वैचारिक दिशा मिली।
इसके बाद का इतिहास देश ने खून से लिखा हुआ देखा। भारतीय जनता पार्टी और विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में चले राम जन्मभूमि आंदोलन में निहत्थे कारसेवकों ने गोलियाँ खाईं, लाठियाँ सहीं और अपने प्राणों की आहुति दी। मुलायम सिंह की सरकार द्वारा अयोध्या में किया गया गोलीकांड आज भी भारतीय लोकतंत्र के माथे पर एक काले धब्बे की तरह दर्ज है। सरयू नदी में बहाए गए कारसेवकों के शव उस समय सत्ता की संवेदनहीनता और क्रूरता का सबसे बड़ा प्रमाण थे।
आज वही आंदोलन, वही बलिदान, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के निर्णायक नेतृत्व में साकार हो चुका है। भव्य राम मंदिर का उद्घाटन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उन असंख्य कारसेवकों को सच्ची श्रद्धांजलि था जिन्होंने “राम” के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। मंदिर के शिखर पर फहराई गई बीस फुट लंबी भगवा पताका ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत की आत्मा को अब दबाया नहीं जा सकता।
दो वर्ष पूर्व जब पूरे देश में राम मंदिर उद्घाटन के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यक्रम आयोजित हो रहे थे, तब पालमपुर के उसी रोटरी भवन में भी एक बैठक हुई। इस बैठक में भाजपा के वरिष्ठ नेता, पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री शांता कुमार जी ने ऐतिहासिक स्मृतियों को साझा करते हुए स्पष्ट कहा कि यह वही भवन है जहाँ राम मंदिर निर्माण का संकल्प लिया गया था। उनका सुझाव सीधा और सहज था—इस भवन का नाम “राम भवन” रखा जाना चाहिए।
यह सुझाव केवल नाम परिवर्तन नहीं था, बल्कि इतिहास को सम्मान देने का आह्वान था। रोटरी क्लब के संस्थापक रहे स्वर्गीय डॉ. शिव कुमार जी स्वयं राम जन्मभूमि आंदोलन के अग्रिम पंक्ति के योद्धा थे। उनके नेतृत्व में हम सब सिर पर कफन बाँधकर अयोध्या पहुँचे थे। जब देश में गोलियाँ चल रही थीं, तब डॉ. शिव कुमार जैसे लोग चुप नहीं बैठे थे।
आज सवाल सीधा है—जब रोटरी भवन का इतिहास राम मंदिर आंदोलन से जुड़ा है, जब इसके निर्माता स्वयं उस संघर्ष के सहभागी रहे हैं, तो फिर “राम भवन” नाम से गुरेज क्यों? यह संकोच किसका है? किस डर के कारण इतिहास को सम्मान देने से बचा जा रहा है?

यदि आज डॉ. शिव कुमार जीवित होते, तो यह प्रश्न उठाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। रोटरी भवन कब का “राम भवन” बन चुका होता। आज आवश्यकता है दिखावटी तटस्थता छोड़कर सत्य और इतिहास के पक्ष में खड़े होने की। राम केवल आस्था नहीं, भारत की चेतना हैं—और उस चेतना का सम्मान होना ही चाहिए।













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