सुक्खू सरकार इस निर्णायक घड़ी में अब कर रही किसका इंतज़ार? 📰 अब सरकार को निर्णायक कदम उठाना ही होगा…! 👊राजभवन की तानाशाही से प्रदेश को अब छुड़ाना ही होगा…लोगों द्वारा बहुमत से चुनी गई सरकार का महत्व दिखाना ही होगा!
विधेयक बनाम विलम्ब : निर्णय अगर अब नहीं तो कभी नहीं



🔥सुक्खू सरकार इस निर्णायक घड़ी में अब कर रही किसका इंतज़ार?
📰 अब सरकार को निर्णायक कदम उठाना ही होगा…!
👊राजभवन की तानाशाही से प्रदेश को अब छुड़ाना ही होगा…लोगों द्वारा बहुमत से चुनी गई सरकार का महत्व दिखाना ही होगा!
SHIMLA
✍️संपादकीय
राजेश सुर्यवंशी, एडिटर इन चीफ, HR Media Group
“कलम के सिपाही अगर सो जाएं तो वतन के कथित मसीहा वतन बेच देंगे… वतन बेच देंगे”

कानूनी विशेषज्ञों की राय के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से राज्यपाल और राष्ट्रपति दोनों के लिए विधेयक पर कार्रवाई की समय सीमा निर्धारित की है
👍— पहली बार पारित विधेयक के लिए तीन माह ओर दूसरी बार पारित विधेयक के लिए एक माह। इसका उद्देश्य था कि किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को व्यक्ति विशेष की मंशा या राजनीतिक स्वार्थ के कारण ठप्प न किया जा सके।
लेकिन हिमाचल प्रदेश में यह संवैधानिक भावना आज उपहास का विषय बन चुकी है।
प्रदेश विधानसभा ने लगातार दूसरी बार विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक पारित करके उसे 25 अगस्त को राजभवन भेजा था। नियमों के अनुसार, राज्यपाल को इसे एक माह के भीतर टिप्पणी सहित सरकार को लौटाना चाहिए था, परंतु यह विधेयक आज तक राजभवन की मेज़ पर धूल फांक रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था की यह अवहेलना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा के विरुद्ध कदम है।
⚖️ अब अधिकार सरकार के पास — फिर यह मौन क्यों?
जब सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी कि यदि राज्यपाल निर्धारित अवधि में बिल नहीं लौटाते, तो सरकार उसे नोटिफाई कर सकती है और अमल में ला सकती है, तो अब सरकार के पास पूरा अधिकार है।
❓सवाल उठता है — मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू आखिर किस दबाव में हैं? जब संविधान खुद सरकार को यह शक्ति देता है, तो फिर अनिर्णय क्यों?
💥प्रदेश की जनता ने सुक्खू सरकार को प्रशासनिक ठहराव तोड़ने का जनादेश दिया था, न कि संवैधानिक अपमान को सहने का। आज जरूरत है साहसिक नेतृत्व की — जो न्यायपालिका की भावना, विधानसभा की प्रतिष्ठा और शिक्षा जगत के हित तीनों की रक्षा कर सके।
🏛️ राजभवन की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिह्न
गवर्नर शिव प्रताप शुक्ल द्वारा संशोधित विधेयक को रोके रखना और इस बीच अपने पसंदीदा व्यक्तियों को कार्यवाहक कुलपति नियुक्त करना संवैधानिक मर्यादाओं से परे कदम है।
न्यायालय पहले ही ऐसी नियुक्तियों को असंवैधानिक ठहरा चुका है, बावजूद इसके बार-बार कार्यवाहक कुलपति बैठाना, राजभवन की तानाशाही और भाई-भतीजावाद का उदाहरण है।
पालमपुर और नौणी के विश्वविद्यालयों में स्थायी नेतृत्व का अभाव संस्थागत स्थिरता को गहरी चोट पहुँचा रहा है। शोध कार्य ठप हैं, फैकल्टी निरुत्साहित है और विश्वविद्यालयों की राष्ट्रीय रैंकिंग लगातार नीचे गिर रही है। शिक्षा संस्थान, जो समाज निर्माण की आधारशिला हैं, आज संवैधानिक रस्साकशी के शिकार बन चुके हैं।
📜 कानूनी दृष्टिकोण : कोई बाधा नहीं
कानूनी जानकारों का मत स्पष्ट है — Presidential Reference केवल सलाह प्रक्रिया है, बाध्यकारी नहीं। यह किसी विधेयक को रोकने या उसकी वैधता पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं देता। इसलिए, सुप्रीम कोर्ट की समय सीमा समाप्त होने के बाद सरकार को किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं। वह विधेयक को सूचनाबद्ध (नोटिफाई) कर तुरंत लागू कर सकती है।
इस स्थिति में सरकार की निष्क्रियता केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का उल्लंघन है।
🚨 अब निर्णायक कदम की घड़ी
प्रदेश के दोनों विश्वविद्यालय — हॉर्टिकल्चर यूनिवर्सिटी नौणी और कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर — आज दिशा विहीन हैं। राजभवन का रवैया न शिक्षा सुधार की भावना के अनुरूप है, न संविधान की भावना के प्रति सम्मानजनक।
अब मुख्यमंत्री सुक्खू को चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रदान किए गए अधिकारों का प्रयोग करते हुए विधेयक को नोटिफाई करें और स्थायी कुलपतियों की नियुक्ति करें।
यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि लोकतंत्र की मर्यादा बहाल करने का कार्य होगा। यदि सरकार और देरी करती है, तो यह संदेश जाएगा कि सत्ता में बैठे लोग संविधान की रक्षा से अधिक राजनीतिक शालीनता में व्यस्त हैं।
In My OPINION…
✍️ मौन अब अपराध बन जाएगा यदि…!
राजभवन की तानाशाही और विधेयक पर लंबितता अब हिमाचल की शिक्षा व्यवस्था के लिए घातक बन चुकी है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश, संविधान का प्रावधान और जनता की उम्मीद — तीनों सरकार की ओर देख रहे हैं।
यदि मुख्यमंत्री अब भी मौन रहे, तो यह संवैधानिक जिम्मेदारी से पलायन होगा।
अब समय है कि सरकार “संविधान बनाम राजनीति” की इस लड़ाई में संविधान के पक्ष में खड़ी हो — और दोनों विश्वविद्यालयों में स्थायी कुलपतियों की नियुक्ति कर इस विवाद पर निर्णायक विराम लगाए।
30-9-2025 को राज्यपाल द्वारा कार्यवाहक कुलपति की नियुक्ति भी नियमोँ के विरुद्ध एवं वरिष्ठता को ताक पर रख कर की गई है।
सूत्रों की मानें तो यह नियुक्ति भी माननीय उच्च न्यायालय के द्वार पर दस्तक दे चुकी है। ऐसे में बड़ा प्रश्न यह उठता है कि आखिर कब तक सरकार की चुप्पी ओर राज्यपाल की हठधर्मिता विश्वविद्यालय का चीरहरण करती रहेगी?





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