CM सुक्खू का मास्टरस्ट्रोक – विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक पास: नौणी और पालमपुर कृषि विश्वविद्यालयों में खुशी की लहर, विश्वविद्यालयों की समस्याएँ अब सीधे मुख्यमंत्री तक, एक महीने के भीतर सरकार करेगी कुलपति नियुक्ति, गवर्नर की अनावश्यक खिचखिच का हुआ अंत
CSKHPKV AND NOUNI UNIVERSITIES
सुक्खू सरकार का साहसिक फैसला – गवर्नर की अनावश्यक खिचखिच का अंत, विश्वविद्यालयों को मिली नई ताकत

हिमाचल प्रदेश विधानसभा में पारित हुआ विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक 2023 केवल एक विधायी कदम नहीं, बल्कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती देने वाला ऐतिहासिक क्षण है। इस विधेयक के जरिए सरकार ने यह साफ कर दिया है कि प्रदेश में सरकार सर्वोपरि है और जनता द्वारा चुनी हुई विधानसभा ही अंतिम निर्णय लेने का अधिकार रखती है।
लंबे समय से यह बहस चल रही थी कि नौणी बागवानी विश्वविद्यालय (सोलन) और कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के कुलपति (VC) किसके अधीन रहें। पहले की व्यवस्था में कुलपति एक तरह से राज्यपाल और सरकार के बीच कठपुतली बनकर रह जाते थे। न तो वे स्वतंत्र रूप से निर्णय ले पाते थे और न ही विश्वविद्यालय की समस्याएँ सीधे सरकार तक पहुँच पाती थीं। नतीजा यह होता था कि विश्वविद्यालयों के विकास कार्य रुक जाते थे और विद्यार्थी, वैज्ञानिक तथा कर्मचारी वर्षों तक परेशान रहते थे।
सबसे बड़ी समस्या थी चांसलर यानी गवर्नर की अनावश्यक मौजूदगी और खिचखिच। राज्यपाल के दफ़्तर से बार-बार टोकाटाकी, आपत्तियाँ और अड़ंगे लगाने की परंपरा ने न केवल विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली को बाधित किया, बल्कि राज्य सरकार की गरिमा को भी आहत किया। यही कारण है कि आज जब यह विधेयक सर्वसम्मति से पारित हुआ है, तो इसे पूरे शिक्षा जगत में स्वर्णिम विजय के रूप में देखा जा रहा है।
मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इस मसले पर जिस साहस, दूरदर्शिता और दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय दिया है, उसकी जितनी भी सराहना की जाए, कम है। उन्होंने विधानसभा और जनता के भरोसे को मजबूत करते हुए यह सुनिश्चित किया कि अब विश्वविद्यालयों की समस्याएँ सीधे सरकार तक जाएँगी और समाधान भी उसी स्तर पर होगा। यह कदम केवल प्रशासनिक सुधार नहीं है, बल्कि इसे एक प्रणालीगत क्रांति भी कहा जा सकता है।
दो वर्ष पहले जब इसी तरह का विधेयक लाया गया था, तो तत्कालीन राज्यपाल ने अनेक आपत्तियाँ लगाकर उसे रोक दिया था। लेकिन सुक्खू सरकार ने हार नहीं मानी। मुख्यमंत्री ने धैर्य रखा, विधेयक को फिर से विधानसभा में लाकर पारित करवाया और उन आपत्तियों को पूरी तरह खारिज कर दिया। यह सुक्खू की जुझारूपन और लोकतांत्रिक आस्था का प्रमाण है। उन्होंने यह संदेश दिया है कि जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों की आवाज़ किसी भी नियुक्त राज्यपाल की सनक से बड़ी होती है।
आज प्रदेश के विद्यार्थियों, वैज्ञानिकों और विश्वविद्यालय कर्मचारियों में नए जोश और आत्मविश्वास का संचार हुआ है। उनका मानना है कि अब उनकी समस्याएँ न तो गवर्नर हाउस की राजनीति में उलझेंगी और न ही महीनों तक दबाई जाएँगी। मुख्यमंत्री तक सीधी पहुँच और सरकार के स्तर पर त्वरित समाधान उन्हें नई ऊर्जा देगा।
सुक्खू सरकार का यह साहसिक फैसला हिमाचल को नई दिशा देने वाला साबित होगा। इससे न केवल विश्वविद्यालयों का संचालन सुचारु होगा, बल्कि कृषि और बागवानी शिक्षा एवं अनुसंधान को भी मजबूती मिलेगी। प्रदेश आने वाले समय में इन क्षेत्रों में नए आयाम स्थापित करेगा।
यह सही मायनों में मुख्यमंत्री सुक्खू की राजनीतिक दूरदर्शिता, लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति निष्ठा और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता की जीत है। आज जनता कह रही है कि यह फैसला हिमाचल की शिक्षा व्यवस्था के लिए “गेम चेंजर” साबित होगा।
Comments are closed.