वाह! मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू की दूरदर्शिता है बेमिसाल, डॉ राजेश शर्मा को दी राजनीतिक संजीवनी, राजनीति में विवेक और शिक्षा में उम्मीद की किरण बने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, राजनीतिक सूझबूझ से कांग्रेस की साख भी बचाई और शिक्षा बोर्ड को सक्षम चेहरा भी दिया

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Rotary
Dr. Sudhir Salhotra, TOP TEN Retina Surgeon of India, Director, Rotary Eye Hospital, Maranda
Rotary GM
Rotary Eye Hospital Maranda Palampur
Dr. Prem Raj Bhardwaj
BMH

संपादकीय

राजनीतिक दूरदर्शिता और शिक्षा सुधार की ओर एक निर्णायक कदम

✍🏻 राजेश सूर्यवंशी,

एडिटर-इन-चीफ़,

HR मीडिया ग्रुप

Rajesh Suryavanshi, Editor-in-Chief, HR MEDIA GROUP, CHAIRMAN : Mission Again st CORRUPTION, H.P., Mob : 9418130904, 898853960)

अत्यधिक कठिन राजनीतिक व प्राकृतिक परिस्थितियों में, कर्ज के बोझ तले दबी हिमाचल प्रदेश सरकार का नेतृत्व मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू को मिला था। हिमाचल प्रदेश को आत्मनिर्भर गोस्वालामुखी बनाने में मुख्यमंत्री महोदय ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। लेकिन प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री ने जो कदम उठाया है, वह केवल एक सामान्य राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि एक सटीक रणनीतिक चतुराई, सामाजिक समझ और प्रशासनिक संतुलन का उदाहरण है। कांगड़ा उपचुनाव के दौरान लिया गया यह निर्णय आने वाले समय में कांग्रेस की स्थिति को और भी मज़बूत करेगा और शिक्षा व्यवस्था को भी सुधारने की दिशा में ले जाएगा।

■ डॉ. राजेश शर्मा: धन-संपन्न लेकिन राजनीति में विफल

कांगड़ा के प्रसिद्ध व्यवसायी डॉ. राजेश शर्मा, बालाजी हॉस्पिटल के मालिक होने के नाते आर्थिक रूप से समृद्ध हैं। लेकिन राजनीति के क्षेत्र में वे बार-बार असफल रहे हैं। 2012 से अब तक वे तीन बार चुनावी मैदान में उतरे — दो बार निर्दलीय और एक बार कांग्रेस के टिकट पर। हर बार जनता ने उन्हें नकार दिया। इसके बावजूद उन्होंने राजनीतिक पावर पाने की महत्वाकांक्षा नहीं छोड़ी।

इस बार वे देहरा विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस का टिकट चाहते थे। उनका मानना था कि वे जनता के बीच स्वीकार्य हो चुके हैं, जबकि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल विपरीत थी। जनता उन्हें एक अवसरवादी के रूप में देखती रही है, जो हर बार हार के बाद फिर टिकट की दौड़ में शामिल हो जाते हैं।

■ मुख्यमंत्री सुक्खू की परख और विवेक

मुख्यमंत्री सुक्खू ने इस परिस्थिति को बहुत ही सूझबूझ से संभाला। न केवल उन्होंने क्षेत्र का दौरा किया, बल्कि जमीनी सर्वेक्षण करवाकर यह जानने की कोशिश की कि जनता वास्तव में क्या चाहती है। रिपोर्ट साफ थी — डॉ. शर्मा की लोकप्रियता न के बराबर है और यदि वे चुनाव लड़ते तो कांग्रेस की सीट निश्चित रूप से हार जाती।

मुख्यमंत्री ने जोखिम लेने से इंकार किया और अपने विवेक से एक साहसिक फैसला लेते हुए अपनी धर्मपत्नी श्रीमती कमलेश ठाकुर को कांग्रेस का प्रत्याशी बनाया। परिणामस्वरूप, श्रीमती ठाकुर ने शानदार जीत दर्ज की और पार्टी को उपचुनाव में एक बड़ी सफलता मिली।

■ डॉ. शर्मा की प्रतिक्रिया: मौन और निष्क्रियता

चुनाव प्रचार के दौरान डॉ. शर्मा पूरी तरह निष्क्रिय रहे। ना तो उन्होंने किसी जनसभा को संबोधित किया, ना ही पार्टी के पक्ष में जनता से संवाद किया। वे केवल औपचारिक उपस्थिति तक सीमित रहे — न उत्साह था, न समर्थन।

फिर भी मिला उन्हें बड़ा इनाम

इसके बावजूद, मुख्यमंत्री सुक्खू ने बड़ा दिल दिखाया। उन्होंने डॉ. शर्मा को हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया — यह न केवल एक संवैधानिक पद है, बल्कि प्रशासनिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण भी है। इस नियुक्ति ने डॉ. शर्मा को वही “पावर” दे दी जिसकी उन्हें वर्षों से तलाश थी।

■ अब क्या है डॉ. शर्मा की असली परीक्षा?

अब जबकि डॉ. शर्मा को राजनीतिक शक्ति सौंप दी गई है, तो उनकी असली परीक्षा शुरू होती है।
उन्हें यह समझना होगा कि यह नियुक्ति कोई “इनाम” नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी है।

👉 उन्हें हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड की सभी कमियों को दूर करने, पारदर्शिता लाने, और बोर्ड को एक आदर्श संस्थान के रूप में स्थापित करने के लिए पूरी निष्ठा से कार्य करना चाहिए।
👉 शिक्षा की गिरती हुई गुणवत्ता और सरकारी स्कूलों की खराब होती छवि को सुधारने के लिए उन्हें ठोस प्रयास करने चाहिए।
👉 सरकारी स्कूलों की गरिमा बनाए रखने के लिए योजनाबद्ध सुधारों की आवश्यकता है, जिसमें पाठ्यक्रम, परीक्षा प्रणाली और शिक्षक प्रशिक्षण जैसे पहलुओं पर गंभीर काम करना होगा।

■ मुख्यमंत्री का एहसान और राजनीतिक कर्ज

यह निर्विवाद रूप से स्वीकार करना होगा कि मुख्यमंत्री सुक्खू ने डॉ. शर्मा का राजनीतिक जीवन समाप्त होने से बचाया।
यदि उन्हें टिकट दिया गया होता और वे बुरी तरह हारते, तो उनका राजनीतिक अध्याय स्थायी रूप से बंद हो जाता।
आज जो सम्मान, शक्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा उन्हें मिली है, वह उन्हें जनता की अपेक्षा मुख्यमंत्री की उदारता से प्राप्त हुई है।

👉 डॉ. शर्मा को चाहिए कि वे मुख्यमंत्री के प्रति सच्ची निष्ठा और कांग्रेस पार्टी के प्रति समर्पण दिखाएं।
👉 यह उनका नैतिक और राजनीतिक कर्तव्य है कि वे दिन-रात मेहनत करें, ताकि शिक्षा व्यवस्था मजबूत हो और पार्टी को भी मजबूती मिले।

यह फैसला एक मिसाल बन सकता है

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का यह निर्णय राजनीति में व्यक्तिगत हित से अधिक जनहित को प्राथमिकता देने की मिसाल है। उन्होंने दिखाया कि एक सच्चा नेता वही होता है जो दूरदर्शिता के साथ-साथ संवेदनशीलता भी रखता हो।

डॉ. शर्मा को यह अवसर “राजनीतिक उपहार” नहीं समझना चाहिए, बल्कि यह उनके आत्म-सुधार और जनसेवा का आखिरी बड़ा मौका हो सकता है। अगर वे इस पर खरे उतरते हैं, तो न केवल वे अपने पुराने असफल राजनीतिक अध्याय को मिटा सकेंगे, बल्कि एक योग्य प्रशासक के रूप में स्थापित भी हो सकेंगे।

📌 राजनीति में अवसर दोबारा नहीं आते। डॉ. शर्मा के पास अब वह शक्ति है, जिसका उन्होंने सपना देखा था — अब समय है उसे साबित करने का।
आज जबकि अधिकतर विधायक जोकि चुनावी जंग जीत कर विधायक बने हैं, यहाँ तक की मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी भी जोकि कठिन परिश्रम के बाद विधायक बनी हैं, उनके पास भी कोई राजनीतिक पद नहीं है, इसके बावज़ूद डॉ राजेश शर्मा बिना की जंग लड़े, बिना किसी मेहनत के चेयरमैन की कुर्सी पर हुए हैं इसके लिए उन्हें मुख्यमंत्री का और परमपिता परमात्मा का कृतज्ञ होना चाहिए।

Dr Sushama Sood
Dr. Sushma women care hospital, LOHNA PALAMPUR
Dr Sushama Sood
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Dr. Swati Katoch Sood, & Dr. Anubhav Sood, Gems of Dental Radiance
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