











मन को बांधे,योग तन को भी साधे
विधा कविता
योग नाम है जोड़ का, तोड़ है हर एक रोग का
मन को बांधे, योग तन को भी साधे रोज़ है
ब्रह्ममहूर्त में उठ जाएगा जो रोगी न रह पाएगा वह
भय,रोग मुक्त, स्वस्थ जीवन जी पाएगा वह
सुबह सुबह की ठंडी बयार छुएगी तन-मन को
प्रफुल्लित कर देगी जीवन के हर पल। को
लंबी लंबी सांस लें कर दे फेफड़ों को साफ़
ओउम् का उच्चारण बढ़ाएगा फिर आत्मविश्वास
कपालभाती प्राणायाम से मिटें पेट के रोग
तरह तरह के पकवानों का लगाइए चाहे भोग
अनुलोम-विलोम से हृदय हो जाएगा सुदृढ़
मौसम चाहे वसंत का हो या आ जाए पतझड़
पवनमुक्तासन करेगा पेट आपका साफ़
जलती सांसों और सीने को देगा बड़ा आराम
भुजंगासन में उठाइए आधा मात्र शरीर
रीढ़ की हड्डी की मिटेगी दर्द,त्रास व पीर
उज्ज्ययी प्राणायाम से करिए शीतल तन मन
जून की गर्मी में भी दे दे जो सर्दी सा कंपनी
भ्रामरी प्राणायाम से मस्तिष्क रखिए फिर शीतल
मिट जाएं चिंताएं सभी मन हो जाए प्रफुल्लित
कुछ पल हर योग मध्य आवश्यक है विश्राम
श्वासन योग है इसका सहायक और प्रमाण
खुश होकर फिर अंत में बजाइए ज़ोर से ताली
भर जाए मन प्रसन्नता से नहीं रहेगा खाली
हास्य व्यायाम अपनाइए रोगों से रहिए दूर
स्वस्थ जीवन का योग से लीजिए लुत्फ भरपूर।
स्वरचित मौलिक रचना
कमलेश सूद
पालमपुर
हिमाचल प्रदेश
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