“इक बार चले आओ, पिताजी…आपके बिना बहुत कुछ अधूरा है ”

जब भी थकता हूँ, रुकता हूँ,
आपके कदमों की छाप ढूंढता हूँ।
छोटा-सा मैं, जब डर जाता था,
आपकी मुस्कान में पूरा संसार पाता था।
आज भी वो सवेरा याद है,
जब आपने हाथ थामकर कहा था –
“बेटा, देना सीखो, लेना नहीं…
ये दुनिया तब सुंदर लगेगी।”
आप अरबों रुपए कमा सकते थे अथाह संपत्ति जोड़ सकते थे ,
लेकिन आपने व्यापार नहीं चुना,
बल्कि जीवन को सेवा में डुबो दिया।
अनाथों के लिए आपने छत बनाई,
अंधेरों को रोशनी सिखाई।
आपने नहीं कहा, “मुझे देखो,”
आपने कहा, “मुझे समझो।”
हर असहाय की आँखों में
आपका चेहरा उग आता है।
पिता जी, आज मैं खड़ा हूँ उस मोड़ पर,
जहाँ आप थे एक वटवृक्ष बनकर।
मेरा मन बार-बार पूछता है—
क्या मैं भी आपके जैसा बन पाऊँगा?
क्या जरूरतमंद और बेसहारों का सहारा बन पाऊंगा. ..?
शनि सेवा सदन की दीवारें,
आज भी आपकी साँसें सुनती हैं।
रोटरी आई हॉस्पिटल की रोशनी,
अब भी आपके नाम से चलती है।
आज माँ ने जो दिया समाज को,
वो आपकी सोच की ही परछाई है।
हम सब केवल माध्यम हैं पिता,
आपकी करुणा की सच्ची गवाही है।
आप एकदम, चुपचाप, खामोशी से चले गए, पर रुके नहीं,
आप हमारी हर उस मुस्कान में हैं, जो आपसे कभी छुपी नहीं,
मेरा प्रण है, पिताजी,
आपकी अनमोल विरासत को बिखरने नहीं दूंगा,
आपके हर अधूरे स्वप्न को मैं साकार करूँगा।

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